साधना पथ भाग 215



देव मणि शुक्ल 
आज की खबर 

साधको , मनुष्य के अन्तर्जीवन की समस्त समस्याओं के मूल में अविद्या माया ही विद्यमान रहती है । गोस्वामी बाबा ने मानस के अरण्य काण्ड में इस अविद्या माया का सूपर्णखा के माध्यम से परिचय दिया है । और भी अनेक प्रसंग है ।
साधकों  - मानस में कथा आती है राजा प्रतापभानु की इनका भी पतन अविद्या माया के कारण ही होता है । पतंजलि योग दर्शन में इस अविद्या माया के पांच रुपए बताये गए हैं । ये पंच क्लेश है , अविद्या , अस्मिता , राग , द्वेष , और अभिनिवेष । सांख्य शास्त्र में इसी को तमस , मोह , महामोह  , तामिश्र , तथा अंधतामिस्र के नाम से सम्बोधित किया गया है । अविद्या से तात्पर्य है कि अज्ञान के कारण जो वस्तु जैसी नहीं है उसे वैसी मान लेना । दृक शक्ति और दर्शन शक्ति का एक जैसे स्वरुप का आभास ही अस्मिता है । किसी वस्तु में सुख की कल्पना कर उसके प्रति आकर्षण को राग कहते हैं । वस्तु के विनाश या उसे दूर होने की इच्छा का उत्पन्न होना ही द्वेष है । मृत्यु भय किसे नहीं व्यथित करता रहता है । मन में मृत्यु की स्वाभाविक वृत्ति ही अभिनिवेष है ।मानस में गोस्वामी बाबा ने इसी का स्मरण दारुण अविद्या पंच विकार के रुप में करते हैं । रावण अथवा रावणत्व का पादुर्भाव इन्हीं वृत्तियों के कारण होता है । मानस का रावण कौन था ? गोस्वामी बाबा के अनुसार वह राजा प्रतापभानु था ।
राजा प्रतापभानु सद्गुण सम्पन्न धर्मात्मा राजा थे , वे यज्ञ करते हैं , दान देते हैं, विश्वविजय करके अपने असाधारण सौर्य का परिचय भी देते हैं। ऐसा धर्मात्मा राजा निशाचर रावण क्यूं बना ?
साधकों  - इस विषय पर गहन मंथन के बाद यही बात निकलती है कि उनके अन्दर दारुण अविद्या के पंच विकारों का समावेश हो गया
।फलाकांक्षा रहित राजा के हृदय में पहले शूकर प्राप्ति का लोभ आ गया ।शूकर की प्राप्ति न होने पर क्रोध आ गया और कपट मुनि के समक्ष तो उसकी असंख्य कामनाओं का पिटारा ही खुल गया ।काम , क्रोध और लोभ ने उसे नरक के द्वार तक पहुंचा दिया। कपट मुनि से प्रतापभानु जिस वस्तु की याचना करता है।, उनमें यही पंचविकारो को स्पष्ट देखा जा सकता है । अविद्या वृत्ति के कारण ही अनित्य शरीर को नित्य बनाने का उपाय जानना चाहते हैं ।यदि वे जीव तत्व की नित्यता को स्वीकार कर लेते, समझ लेते तो जान लेते कि सौ कल्पों की बात क्या है, वह तो अनन्त काल तक रहने वाला है । मृत्यु अवसम्भावी है जानते हुए भी अमर बनने का स्वप्न देखते हैं । अस्मिता के कारण जीव और शरीर को सर्वथा एक मानकर सौ कल्पों तक जीवित रहना चाहते हैं ।राज्य सुख मिलता रहे अतः राज्य सत्ता भी चाहिए यह उनके अतृप्त राग का परिचायक है।  वैसे तो कहते हैं कि मुझे किसी फल की आकांक्षा नहीं है फिर भी शत्रुओं के प्रति उसकी द्वेष भावना अभी भी विद्यमान है तभी रिपुहीन राज्य चाहते हैं ।यह जानते हुए कि मृत्यु अटल सत्य है किन्तु अभिनिवेष के कारण मृत्यु की कल्पना से ही कांप उठता है ।
साधकों  -कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि जब व्यक्ति के अन्तःकरण में अविद्या माया के कारण आकांक्षाएं जन्म लेती है तब वहीं से रावण के पादुर्भाव की भूमिका बन जाती है। अन्तःकरण के दारुण अविद्या पंचजनित विकार नष्ट हो जाए इसके लिए गोस्वामी बाबा का कहना है कि मानस की अधिक नहीं पांच सात चौपाइयां सोच समझ कर हृदय में धारण करें उसका मनन चिंतन अनुशीलन करते रहे।हमारा आपका परम कल्याण हो जाएगा ।

टिप्पणियाँ

  1. लिखने से केवल अपनी बुद्धि का।ही विकास नहीं जनमानस का भी बुद्धि विकास संभव होता है | आप द्वारा लिखा जा रहा साधना पथ समाज का उत्तम पथप्रदर्शक साबित होगा |

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