साधना पथ भाग 178



देव मणि शुक्ल 

साधकों  -- हनुमान चालीसा में वर्णन आता है कि प्रभु श्रीराम ने जो मुद्रिका सीता जी की खोज के समय हनुमान जी को दी थी , उसे हनुमान जी ने मुख में रख लिया था ।

प्रभु मुद्रिका मेल मुख माहीं 

 । मुद्रिका तो हांथ में धारण की जाती है, या शरीर में कहीं सुरक्षित जगह रखी जाती है पर ज्ञानियों में अग्रणी हनुमान जी महराज ने उसे मुख में क्यों रख लिया ? 
साधकों  - हनुमान जी ने विचार किया कि प्रभु ने यात्रा के लिए जो सम्बल दिया है , इसमें राम नाम अंकित है , राम नाम को तो कंठ या मुख में ही रखना चाहिए। हनुमान जी ने मुख में मुद्रिका रखी , इसके माध्यम से हनुमान जी महराज ने हम सबको एक संदेश दिया है । यद्यपि जो वस्तु मुख में चली जाती है, वह जूठी हो जाती है, परन्तु राम नाम ऐसा है जो जूठा नहीं होता , अपितु वह  मुंह को पवित्र कर देता है। भगवान का नाम तो मुख से ही निकलता है , तो क्या हम आप प्रवचन के समय कान बन्द कर लेते हैं कि कहीं जूठी वस्तु कान में प्रवेश न कर जाए ?  वक्ता के मुख से जिस राम नाम की कथा श्रवण करते हैं वह भी तो एक प्रकार से जूठी होती है , फिर भी हमको आपको उस कथा में आनन्द रस की प्राप्ति होती है। प्रभु का नाम तो असुद्ध को सुद्ध करने वाला है। गुरुदेव भी जब हमें गुरुमंत्र प्रदान करते हैं तो वह भी जूठा होता है पर उससे हमारा कल्याण हो जाता है । 
साधकों  - भगवान शिव के मुख में भी राम नाम हर समय रहता है। विष का पान करते ही राम और विष मिलकर एक हो ग‌ए और उन्हें परम *विश्राम* की उपलब्धि हो ग‌ई । आइए हम भी अपने मुख से यदा कदा नहीं सदा राम नाम जपे , यह हमें परम पवित्र कर देगा , जब यह विष को शान्त कर सकता है तो हमारे अन्दर के विषय को क्यूं नहीं शान्त करके पवित्र करेगा ।

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