साधना पथ भाग 201

देव मणि शुक्ल
आज की खबर 

साधकों  मानस में प्रसंग आता है निषादराज गुह का । इस प्रसंग के माध्यम से हमें बहुत कुछ सीखने को प्राप्त होता है । जब भगवान श्रीराम श्रृंगवेरपुर पहुंचे और  निषादराज ने जैसे यह समाचार सुना उसकी प्रसन्नता का ठिकाना नही रहा । उसने तुरन्त अपने भाई बन्धुओ को एकत्र किया और थोडे़ से फल फूल लेकर श्रीराम जी का दर्शन करने के लिये चल देता है । गुहराज प्रेम मग्न है , क्या श्रीराम मुझे अपनायेंगे ? श्रीराम मुझसे गले तो मिलेंगे नही ? मुझसे बात करेंगे ? चलिये कोई बात नही अगर वे मुझे एक बार देख भी लेंगे तो मेरा उद्धार हो जायेगा । ऐसी मन मे तरह तरह की कल्पना करता हुआ निषादराज भगवान श्रीराम के सम्मुख पहुँचा ।
साधकों  -इस प्रसंग पर एक बात जरुर कहना चाहूँगा , रात दिन पुण्य का दावा करने से अच्छा है कि व्यक्ति यह कहे कि मै पापी हूँ ।  क्या हम अपने आपको पापी कह सकते है ? मन्दिर मे भले ही मन कहे कि मै पापी हूँ , दीन हूँ पर बाजार मे यदि कोई कह दे कि तुम पापी हो तो उस पर मानहानि का केश कर देंगे । संत इसलिये हमसे आगे हैं कि वे अपने आपको पापी कहने की छमता रखते है और पुण्य कहते हैं इसलिये पीछे हैं । हम किसी दिन व्रत रहें और उस दिन कोई हमसे पूँछे , भोजन किया ? तब उसे और उसके माध्यम से और लोगो को यह बताते हुये बहुत आनन्द आता है कि आज हमारा व्रत है । धन्य है गोस्वामी बाबा , सूरदास ,जिन्होने लोगो के सामने यह कहा कि हम पापी हैं । जीवन मे एक बात जरुर मान ले कि
 पाप को प्रकट करने एवं पुण्य को छिपाने से ही कल्याण होगा। 
दूसरा कोई रास्ता नही है ।
साधको - एक पापी प्रभु की शरण मे आ रहा हैं ।दूर से भगवान के चरणारविन्द मे दण्डवत प्रणाम किया -

करि दण्डवत भेंट धरि आगे । प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागे ।।

निषादराज के नेत्र सजल हो उठे । श्रीराम जी ने गुह की भाव दशा देखी - गुह हाँथ जोडकर कहता है - महराज ! मै तो पापी हूँ , भील हूँ । दुनिया कहती है कि जो गंगा स्नान करता है वह पबित्र हो जाता हैं , पर हम तो रोज स्नान करते हैं फिर भी गंगा हमे पबित्र नही करती । अब गंगाजी को भी पबित्र करने दूसरी गंगा आ गयी है , अतः अब सायद हमारा बेडा़ पार हो जाय ।सजल नेत्रो से गुह राम दर्शन मे मग्न है ।उसका भावावेश देखकर राम जी ने उसे अपने पास हाथ पकडकर बैठाया -

सहज सनेह बिबस रघुराई । पूँछी कुशल निकट बैठाई ।।

गुह दण्डवत प्रणाम किये लेटा है , भगवान श्रीराम ने गुह का हाँथ पकडकर खडा़ किया ।यह गुहराज की कल्पना के बाहर था । उसने सोचा था कि श्रीराम जी एक बार मेरी ओर देख ले यही बहुत है पर जब गुह को रामजी ने गले लगाया तब गुह देहभान भूल गया । आज गुहराज राम रुप बन गया ।
साधकों  - गोस्वामी बाबा ने दिखाया कि यहीं से रामराज का उद्घाटन हुआ । रामराज की कल्पना करना है तो सबसे पहले झोपडी़ मे बैठे हुये को बुलाने जाना चाहिये । रामराज के विषय मे सोचना भी हो तो जिसकी आँखो मे आंसू बहते हो उसे प्यार करो । श्रीरामजी यहाँ से पहला कदम रामराज का चले हैं । 
साधकों  - हम ब्राम्ह्यण कुल मे जन्म लिये है तो इसका अर्थ यह नही कि हम दूसरो को नीच माने । तिलक लगाने वाले यह सोचें कि तिलक न लगाने वाले अपबित्र हैं ।कौन पबित्र , कौन अपबित्र ? कौन बडा़ , कौन छोटा ? इसका निर्णय जिसने जन्म दिया है उसे करने दो । ईश्वर का नियम अपने हांथ मे न लो । हमे क्या अधिकार है कि ईश्वर की सृष्टि को नीच गिनने का ? हमे तो सब एक लगते है ।

चतुराई चूल्हे पडी़ धिकहि पड्यो आचार ।
तुलसी हरि भक्ति बिनु चारो बरन बिचार ।।

बस जीवन मे प्रेम चाहिये । राम कथा तो प्रेम प्रधान कथा है ।यह राग प्रधान ग्रन्थ है , विराग प्रधान नही ।
साधकों  - आज निषादराज रामजी की भुजा मे बन्द हैं ।यह मनुष्य कितना भाग्यशाली है धीरे से प्रभु के हाँथ मे से निकला और उनके चरणों पर गिर पडा़ ।रामजी गुहराज को बुलाते है , तब गुहराज इतना ही बोल सका - महराज ! मेरा आज आपने बेडा़ पार कर दिया ।आज मेरी धरती पबित्र हो गयी ।सदियों से हमे कोई नही बुलाता ~आज आपने पतितपावन नाम सच साबित कर दिया ।
साधकों  यदि रामजी की संस्कृति को अपनाना है , हम श्रीराम जी के ही वंसज है यह सिद्ध करना है तो
 छोटे से छोटे व्यक्ति को बुलाओ ।
बडे़ धनाढ्य व्यक्ति को तो सभी बुलाते हैं , इसमे कौन सी बडी़ बात है पर किसी गरीब , परेशान , निरीह व्यक्ति का सहारा बनो तो समझा जाय कि हम राम के वंशज है । 
राम जी ने तो पूरे जीवन काल मे उसी को अपनाया जिसे . संसार ने ठुकराया।

गुहराज आनन्द विभोर होकर सीताजी एवं लक्ष्मण जी का वन्दन करते है । गुहराज भाव विभोर होकर कहते है - महराज !

देव धरनि धनु धाम तुम्हारा । मै जनु नीचु सहित परिवारा ।।
यह पृथ्वी , धन और घर सब आपका ही है । मै परिवार सहित आपका सेवक हूँ । महराज जिसे मै अपना मानता रहा , वह सब आपका ही है । ऐसी समर्पण भावना ही हमें प्रभु के सन्निकट कर सकती है ।

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