साधना पथ भाग 202
देव मणि शुक्ल
साधकों सर्वत्र भगवान को देखे , यह तो सामान्य सूत्र है । वेद पुराण शास्त्र सभी जगह ऐसा लिखा है कि भगवान का निवास सर्वत्र है । पर क्या हम उस सर्वत्र को देख पाते हैं ? निर्गुण निराकार ईश्वर तो सर्वत्र विद्यमान है । इतना जानने के बाद भी हम अनाचार , अत्याचार , पापाचार करते रहते है । अगर हमे अपने इतने निकटस्थ ईश्वर का भय होता तो क्या हम इस प्रकार पापाचार करते । आखिर क्यूं हमे ईश्वर से भय नही होता है ? और यही भय प्रकट कैसे हो ?
साधकों -इसका एक प्रमुख कारण यह है कि हम ईश्वर पर पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास रखते ही नहीं । सुनते हैं , पढ़ते हैं , जानते हैं पर मानते नहीं । परन्तु वहीं जब हम किसी के प्रति यह धारणा बना लें कि यदि हम गलत करेंगे तो अमुक हमें दण्ड देगा । डर से हम उसके प्रति गलत नहीं करते । गोस्वामी बाबा जी आज की परिस्थिति की कल्पना पहले ही कर लिए थे तभी तो उन्होंने मानस में एक सूत्र बताया है । गोस्वामी बाबा कहते है कि - सर्वत्र उस ईश्वर को देखे जो धनुष बाण धारी है ।
जहं तहं देख धर धनुबाना
धनुषधारी भगवान का स्मरण यहाँ पर करके गोस्वामी बाबा बताना चाहते है कि यद्यपि भगवान का मूल स्वरुप करुणा दया का हैं पर यह भक्तो के लिये है ।जो खल है दुष्ट है वे सीधे नही मानते । उन्हे दण्डित करने के लिये प्रभु का धनुषधारी रुप ही अपेक्षित है । सर्वत्र धनुषधारी रुप मे मारीच प्रभु का दर्शन करता था । और आज तो धनुषधारी रुप की अत्यन्त आवश्यकता है क्यूँकि कलियुग मे मनुष्य के हृदय मे
तब लगि हृदय बसत खल नाना । लोभ मोह मत्सर भव माना ।।
ये तभी तक हमारे हृदय मे है जब तक धनुषधारी राम का वास नही हो जाता -
जब लगि उर न बसत रघुनाथा । धरे चाप सायक कटि भाथा ।।
हनुमान जी महराज अपने हृदय मे सदा सर्वदा धनुषधारी राम को ही विराजमान करते है -
जासु हृदय आगार बसहु राम सर चाप धरि ।
साधकों - हमारे जीवन मे जब कभी चिन्ता ,जलन , कष्ट , पीडा हो तब मुस्कराते हुये धनुषधारी श्रीराम का स्मरण करें , दर्शन करें पीडा़ वेदना से मुक्ति मिल जायेगी ।
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