साधना पथ भाग 207



देव मणि शुक्ल 
आज की खबर 

न तत्रं मंत्रं न स्तुति न व च ज्ञानं भवविधि
विकारं मोहस्त्वं किम तद अतस्त्वं अर्पितं
त्व दृष्ट्वं साहचर्यं तव चरण सेवा मम हितै
न देवो न अन्यं तव गुरु वदं त्व अत तवं ।।

हे भव्यमूर्ति! न तो  मैं मंत्र जानता हूं, न तंत्र न योग जानता हूं।।न दर्शन न शास्त्र का ज्ञान है मुझे और न सही ढंग से मंत्र-जप ही करना आता है।
मुझे तो स्तुति करनी भी नहीं आती, मैं तो यह भी नही जानता  कि किस प्रकार से आपकी आराधना करू?
शरीर भी कई प्रकार के विकारों से ग्रस्त है, मैला है गंदा है।।कभी -कभी इसमें काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद की प्रवृत्तियां भी आ जाती है
इन पंच-प्रवृत्तियो से ग्रसित शरीर मैं आपके चरणों में कैसे अर्पित करूँ?
मैं किसी भी प्रकार की आराधना नहीं जानता, मैं यह भी नहीं जानता कि यज्ञ क्या है और पूजा-पाठ क्या है? तपस्या क्या है और।साधना क्या है? अर्चना क्या है और बोलने का तरीका क्या है? और न
ही मझे इन सबकी आवश्यकता है। मैं तो केवल इतना ही जानता हूँ कि आप मेरे आराध्य हैं।

" मेरे लिए तो अर्चना-आराधना, पूजा-पद्धति, जप-तप,
योग-दर्शन, मीमांसा, ध्यान, धारणा तथा समाधि जो कुछ भी कहें, केवल मात्र आपके दर्शन हैं, केवल आपका सत्संग है, केवल आपका साहचर्य है, केवल आपके साथ बैठने की पद्धति है। केवल यही एक क्रिया है, कि मैं किसी भी तरीके से आपका सान्निध्य प्राप्त करूं, सही
अर्थों में आपका शिष्य कहला सकू, आपके ओठों पर मेरा नाम आ सके, आप मुझे भुजाओं में भर सकें, मैं कभी आपके सीने से लग कर आसू बहा सकू।

मैं दासानुदास, अकिंचन, दीन-हीन, मलीन,
विषय-वासनाओं से युक्त, आपका हूं, और यह स्थिति मैं संसार की श्रेष्ठतम स्थिति मानता हूं।

यह सब कुछ आपका ही है, और एकमात्र आप ही मेरे हैं, आपके अलावा इस ब्रह्माण्ड में कोई और मेरा है ही नहीं, किसी और को मैं अपना मानता ही नहीं। 

मुझे विश्वास है, कि आप अत्यन्त कृपालु, दयालु,स्नेही है,आप मुझे अपना लें, यही मेरा सौभाग्य है।

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