साधना पथ भाग 209

देव मणि शुक्ल 
आज की खबर 


आज नहीं तो कल मेरी बात आपको सुननी ही पड़ेगी क्यों कि साधना ही एकमात्र विकल्प है इस महत्वाकांक्षी मानव समाज के वितृष्णा रूपी  बारूद के  ढेर पर स्वयं जाग्रत एवं चैतन्य बने रहकर अपनों को बनाए रखने के लिए ।मेरे आत्मीय गुरु भाई बहनों एवं प्रबुद्ध मित्रों पाठकों और परिचितों आज हम आपके मध्य एक बहुत ही प्रासंगिक प्रश्न एवं उसका उत्तर लेकर एकदम स्पष्ट विचार मंथन करना चाहता हूं। क्योंकि कि साधना मंत्र तंत्र,हवन ,जप को हमारा समाज आज एक विचित्र नजरिये से देखने का तथा समझने का आदी हो गया है।
कहीं पर भी इस तरह की एक्टिविटीज होते देख उसके मन में संदेह उत्पन्न होने लगता है कि जरूर यहां पर किसी का अहित करने का कोई षड्यंत्र रचा जा रहा है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि उसने कुछ स्वार्थी नशेड़ी और रूपक बनाए हुए तान्त्रिकों को अपने आसपास किसीको कुछ ले देकर ठगते हुए ही देखा है। और ऐसे भ्रष्ट घटिया लोगों की वजह से एक उच्च कोटि का सनातनी शिव शास्त्र हमारे बीच हास्य एवं घृणा का पात्र बनकर रह गया ,आज इसीलिए हमारे शास्त्रों में लिपि बध्य आठों सिद्धियां अणिमा लघिमा अदृष्य प्रकाट्य,वायु गमन सब मिथ्या और भ्रम प्रतीत होती हैं और हमारा कोमल मन उनके होने पाने समझने आदि सबसे अविश्वास नीयता का भाव लेकर खड़ा हो जाता है अथवा अनर्गल तर्क कुतर्क करने लगता है ऐसा इसलिए होता है कि हमारे अंदर अपनी समस्याओं का समाधान तो हर हाल में चाहिए परन्तु कैसे? किससे ? और कहां?अब समाज में तीन वर्ग हैं उच्च, मध्य और निम्न यानि
धनाढ्य,साधारण और गरीब। धनवान इतना रोगों से ग्रस्त दवाओं से त्रस्त सोचता है कि कुछ ऐसा हो जाए कि कोई मेरे लिए ऐसा कुछ करदे कि मेरे बिना हिले डुले ही सब रोग कोई लेकर मुझे निरोगी काया प्रदान कर दें और मैं पुनः पिछले जैसा जीवन जी सकूं पैसा कुछ भी खर्च हो। मध्यम वर्ग अपनी सामाजिक गति रोधों और आर्थिक अनुकूलता हेतु कुछ उपाय चाहता है किसी तरह थोडे़ बहुत पैसे खर्च करके ,रह गया निर्धन वर्ग वह हर हाल में धन दौलत की आकांक्षा रखता है साधनाओं में श्रम
के माध्यम से।
मेरी समझ से परिवार में समस्या कोई भी हो वह पूरे पारिवारिक जीवन में उथल पुथल मचा देती है जीवन को नीरस और अविश्वसनीय बना देती है ,जैसे शरीर के किसी भाग में दर्द पीड़ा हो तो कष्ट तो पूरै शरीर को होता ही है।इस तरह हम  धीरे धीरे उन्नति से अवनति की ओर बढ़ते चले जाते हैं जिसमें दो ही मूल परेशानियां होती हैं और हमें लगता है कि हम  परेशानियों के अथाह दलदल में डूब गये हैं । इससे कैसे उद्धार हो ,तब आती है साधनाओं के माध्यम से सरलतापूर्वक समस्याओं से समाधान पाना ।
समाधान शब्द आते ही साधना का उद्भव हो जाता है अब साधना के लिए आवश्यकता होती है एक अदद योग्य एवं जानकार व्यक्ति की ,जो उस पथ का गामी हो जिसने स्वयं जीवन में त्याग तपस्या और उच्च कोटि
के गुरु की सानिध्यता में ज्ञानार्जन किया हो , साधनाएं सम्पन्न की हो यानि किसी योग्य गुरु की शरण प्राप्त हो।जीवन की पहली समस्या है शत्रुओं की विरोधिओं की रोग भी आपका शत्रु ही है, पारिवारिक कोई भी ऊपरी बाहरी बाधा भी आपकी शत्रु ही है । क्यों कि जो भी स्थित आपके और आपके परिवार के विकास में बाधक हो वह आपका शत्रु ही है। दूसरी बाधा निर्धनता यानि आर्थिक समस्या यह भी जीवन की एक असह्यनीय  कष्टप्रद और दुष्कर स्थित है इस दर्द को भी वही समझ सकता है जिसने इसे झेला है कर्ज और अपमान का घूंट पिया हो । वैसे तो हमारे शास्त्रों में इतनी साधनाएं हैं कि आपका  यह जीवन भी छोटा पड़ जायेगा तब भी सभी साधनाएं पूर्ण न हो सकेंगी ।जैसे हमारे पुस्तकालयों में असीमित पुस्तक भंडारण होता है परन्तु हम बच्चों के बस्ते में वही पुस्तकें रखते हैं जो हमारे गुरुजनों अध्यापकों द्वारा चिन्हित की जाती हैं क्योंकि गुरु ही इस बात को जानते हैं।कि किस कक्षा में कौन सी पुस्तक पढ़ाना बच्चे को हितकर व आवश्यक होगा। इसी तरह योग्य गुरु भी साधनाओं का क्रम चयनित करता है की शिष्य साधक को कब कौन सी साधना लाभप्रद एवं सफलता दायक सिद्धि दायक होगी।
साधना के लिए दो ही चीजें सर्वथा मुख्य होती हैं एक तो समय क्षण (पिन प्वाइंट) उस उपयुक्त समय में १००% साधना सफल होती ही है ऐसा मेरा अनुभव है।दूसरी स्थिति साधना विधान की क्रमवध्यता जैसे जैसे गुरु ने समझाया हो उसे उसी अनुरूप सम्पन्न करना ।एक बात आप गांठ बांध लीजिए महंगी से महंगी यंत्र सामग्री माला,दीक्षा लेकर आप धारण कर लें साधना सिद्धि, प्रत्यक्षी करण कदापि सम्भव नहीं है आसन पर बैठकर साधना मंत्र जप विधिवत आपको करना ही होगी योग्य गुरु के सानिध्य में , इसमें कोई शार्टकट नहीं है। प्राण प्रतिष्ठित सामग्री आपकी साधन मात्र है , उच्च दीक्षा आपकी दिशा निर्देशन मात्र है लेकिन साधना हर हाल में आपको ही करनी पड़ेगी।उदाहरण के लिए आपको अपने गन्तब्य के लिए नदी पार करनी है तो सामग्री आपका साधन यानि नाव है बैठाकर नदी पार करवा देगी ,दीक्षा आपको दिशानिर्देश कर पथ प्रदर्शन करेगी कौन सा रास्ता सीधा लक्ष्य तक ले जायेगा शीघ्र सफलता प्राप्ति कारक है अब इसमें पथिक तो आप ही हैं सफर तो आपको ही तय करना पड़ेगा ,साधन और मार्गदर्शन तो अपनी जगह पर है ।साधना तो हर हाल में आपको ही करनी पड़ेगी। परिक्षार्थी आप हैं ।परीक्षा तो आपको ही हर हाल में देनी पड़ेगी । इसमें   कोई दो राय नहीं है।

टिप्पणियाँ

  1. अति उत्तम ।समाज ,परिवार सभी के लिए अति सुंदर कार्यो को दर्शाया गया है।मेरे शब्द कोष में कुछ बचा ही नहीं है जिसे मैं वर्णन कर सकूँ।
    आपकी लेखनी को बारम्बार प्राणाम करतीं हूँ।🙏🙏

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