साधना पथ भाग 210

देव मणि शुक्ल 
आज की खबर 

 साधकों  एकबार  एक तोते और एक बगलेे में अभिन्न मित्रता हो गई ।चूंकि फेशबुक की मित्रता थी। दोनों एक दूसरे पर चैट पर घंटो बतियाते रहते,  दोनों एक दूसरे के रहन सहन आचार विचार से अनविज्ञ। खैर ये सिलसिला  सालों साल  चलता रहा  दोस्ती  अति प्रगाढ़ हो गई  क्योंकि  बातों के माध्यम से ही  एक दूसरे का आदान- प्रदान  संभव था ।कभी-कभी दोनों  वीडियो कॉलिंग से  एक दूसरे को  हरा रंग और सफेद रंग का देखकर अति प्रसन्न हो जाते  और काफी देर तक बातें करते रहते ।  अंतरंगता के छडो़ं का इंजॉय करते और अंततः अपनीअपनी बात समाप्त कर सो  जाते ।
 बगुला तालाब के किनारे पेड़ पर रहता था और उधर तोता एक किसान के खेत की मेड़ पर एक बडे़से वृक्ष की डाल पर घोंसला बनाकर रहता था ।
 दोनों एक दूसरे से मिलते और अपनी आपस की बातें शेयर करते ,धीरे धीरे समय गुजरा , बगले और तोते जैसेे पक्षी वर्ग के समान पखेरुओं का समूह बन गया।सभी समुदाय बगला तोता भाई भाई कहकर खूब मस्ती करते और अपने अपने घरौंदो को चले जाते ।समय बीतता चला गया। एक दिन बगले ने तोते को अपने निवास स्थान का पता देकर दावतनामा देने का वादा किया। 
अन्तोत्गत्वा एक दिन बगले ने तोते से कहा  कि भाई हमारे यहां  कल दावते ज़श्न है हम दोनों भाई भाई हैं ।अतः आप अपने  समस्त फेशबुकिया मित्र समुदाय सहित हमारे यहां कल शाम दावत पर आमंत्रित हैं। तोते ने सहर्ष दावतनामा कुबूल कर,  आनन फानन सभी मित्रों को व्हाटसेप काल कर दिया। नियत समय पर सम्पूर्ण  तोता बगुला भाई-भाई का नारा लगाते हुए,  बगले के यहां दावत करने के लिए एक साथ चल दिये ।
आनन्द  के क्षण थे, चोंच पंख लडा़ते , फड़ फडा़ते जब वे तालाब पर पहुंचे ,तो बगले ने अपने मित्र के स्वागत के लिए बहुत सी मछलियां मेड़की केचुए और केकड़े खाने के लिए पेड़ के पत्तों पर सजाए हुए थे।
 तोता समूह भोज स्थल पर पहुँच गया।  मित्र  तोते को नहीं मालूम था कि उसके मित्र का  खानपान क्या है ।लेकिन मित्रता प्रगाढ़ थी उसमें कोई भेद भाव नहीं था।दावते ज़श्न की कतार सजी हुई थीं बड़े पेड़ के पत्तों से,उचित समय पर भोजन का अनावरण किया गया , तोतों ने जब वह सब देखा तो सब एक दूसरे का मुँह देखने लगे क्योंकि वे सब गले में कंठी धारण किए हुए,ऐसी अभोज्य वस्तुओं की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखते ,खाना तो बहुत दूर की बात  ?  मामले की गम्भीरता और ,समय की वस्तुस्थिति स्थिति भाँपते हुए उस मित्र  वयोवृद्ध तोते ने स्थिति सम्हाली।               उसने कहा भाई, बगला मित्रों आज एकादशी तिथि है मेरे समुदाय का आज व्रत है और मैं अति प्रसन्नतावस भूल गया । आपके अनुनय विनय को मैं भला कैसे ठुकराता। अतः क्षमा प्रार्थी हूँ । भाई माफ करना। , आपका भोजन ग्रहण नहीं सकता ।आपके आग्रह पर मैं चला आया और अब हम सब वापस जाते हैं , आशा है आप सब बुरा नहीं  मानेंगे धन्यवाद ।। इतना कह कर सभी दोस्त मर्यादा और शालीनता के साथ वहां से अपने स्थान को वापस लौट आए । क्यों कि सात्विक भोजन से उनके संस्कार भी विनम्र , परहित और अहिंसक थे। उधर  बगुला समुदाय अति प्रसन्न हुआ कि चलो कई दिनों का भोजन हमारे पास भंडार हो गया । अच्छा ही हुआ।
समय बीतता गया, फिर दोनों समुदाय आपस में मिलकर चैट करते ,चर्चाएं होतीं , एक दिन तोते ने कहा , बगला भाई, आओ  कल  हमारे यहां खेतों में नई फसल के उपलक्ष में  प्रीति भोज कार्यक्रम है । हमारे यहां आप सब लोंगों को स्नेह निमंत्रण है । हमारें यहाँ खेतों में काफी कुछ खाने के लिए उपलब्ध हो गया है। आप हमारे यहाँ सहर्ष पधारें और हम आप को अति स्वादिष्ट सुन्दर भोजन करवाएंगे ।
निर्धारित तिथि पर बगुला समाज तोते के यहाँ,  उसके निवास पर पहुंचा।  वहां पर तोतों ने अच्छे-अच्छे फल मक्के के भुट्टे ,ज्वार की बाली ,काकुनी की वाली ,हरी मिर्च और मौसमी फल इत्यादि सब खाने के भोजन की सुंदर व्यवस्था पंक्ति बध्य आवर युक्त सजाई हुई थी ।
उचित समय पर भोजन का अनावरण किया गया ,कई प्रकार के घासफूशीय व्यर्थ व्यंजन बगलों ने देखे ,सब आपस मे कानाफूसी करने लगे यह भी कोई दावत है, इन्होने तो हमारा मजाक बना कर रख दिया। बगलों ने आपा खो दिया, कहते हैं जैसा अन्न वैसा मन, तामसी भोजन की वजह से उनका धैर्य और विवेक दोनों नष्ट हो गये थे। आक्रामकता और धोखा उनका शिकार करने की वजह से पैतृक गुण था ।बगले  बोले, भाई तोता इसमें तो खाने योग्य कुछ भी नहीं है । यह घास फूस खाने से हमारा भला नहीं होगा ।हम तो मृत मांस भक्षी समुदाय के लोग हैं, हमको हमारा भोजन उपलब्ध करवा सको तो बोलो ,अन्यथा मुझसे बुरा कोई नहीं होगा । हमारी भूख और अधिक बढी़ तो हमारा समुदाय तुम्हारे सबके पंख नोच कर माँस की दावत उडा़ डालेंगे। क्यों कि हम जानते हैं कि वक्त तुम हमें हमारा भोजन उपलब्ध नहीं करवा सकते हो। धीरे धीरे बात बिगड़ती चली गई और उधर बगलों की भूख भी अधिक तेज हो गई थी अतः बगलों ने तोतों के समुदाय पर धावा बोल दिया । स्थिति बिगड़ते देख तोतों ने जान बचाकर भागने में भलाई समझी ,सभी उड़ लिए,  बगलों ने  भी  पीछा किया  लेकिन वह उनको पा नहीं सके क्योंकि  तोते  100 किलोमीटर रोज उड़ान भरने वाले  और कहां बगले एक टांग पर घात लगाकर  तालाब में दिन भर बैठे रहने वाले ,अतः वह खिसिआ कर वापस अपने स्थान को चले गए ।इधर  शेष बचे दोनों मित्र आपस में इस कार्यवाही से बहुत क्षुब्ध थे।  बगले ने अपने समुदाय की धृष्टता के लिए मित्र तोते से क्षमा मांगी और कहा कि भाई तोते हम अपने संप्रदाय से बहुत क्षुब्ध है ।आप हमें क्षमा करें।
तोते ने कहा भाई बगुला हम एक प्रजाति के जरूर है पंख आपको भी ,पंख हमारे पास भी ,चोंच आपके पास भी हमारे पास भी ,पंजे आपके हमारे एक जैसे हमारी आपकी प्रजाति एक है , हम पक्षी जरुर हैं। लेकिन हमारे रहन सहन और भोजन में बहुत बड़ी भिन्नता है ।भोजन खानपान का हमारे जीवन पर बहुत बड़ा प्रभाव होता है  कहते हैं।

 *जैसा खाओगे अन्न वैसा बनेगा मन*
 *जैसा पियोगे पानी वैसी बनेगी बानी*

हमे एक दूसरे के विषय में भलीभाँति जान लेना चाहिए था तभी एक दूसरे से मित्रता का हाथ बढा़ना उचित था। 
 अतः हम एक दूसरे के भाई भाई तो नहीं हो सकते ,मित्रता आपसी सम्बन्धो का कोई मानदण्ड  नहीं है।  क्योंकि जब तक हमारे आचार विचार भोजन शैली रहन सहन और सामाजिक दृष्टिकोण नहीं मिलते हैं तब तक यह भाई भाई का खोखला पन का नारा व्यर्थ है । आप अपने जलीय क्षेत्र  पर खुश रहो और मैं अपने खेत मैदान के पेड़ की  डाल पर खुश हूं ऐसा कहकर तोता अपने घोंसले में बैठ कर फल खाने लगाः और बगुला अपने समूह के साथ तालाब पर शिकार को चला गया । 
हमारे कथानक का आशय समझ कर हमारे गुरु भाई बहनों के अलावा अन्य सामान्य  मित्र गण अपने अभोज्य पदार्थों का सेवन छोड़कर हमें अनुग्रहित कर हमारी मित्रता का सम्मान करेंगे ,तथा अपने स्वास्थ्य और आचार विचार को पुष्ट एवं दृढ़ता प्रदान करेंगे।

टिप्पणियाँ

  1. अति सुंदर जन कल्याणकारी लेख

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  2. यदि व्यक्ति अपना कल्याण चाहता है तो साधनापथ अवश्य पढ़ें
    विश्व नाथ त्रिपाठी

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  3. अति सुंदर शिक्षाप्रद कहानी।
    जय ग़ुरूदेव।🙏🙏

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  4. बहुत ही सुंदर लेख

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  5. जय हो ,जय गुरुदेव🙏🙏🙏🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹

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  6. अति सुंदर लेखनी , जय गुरुदेव 🙏🙏🙏🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹

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  7. अमृत वचन , जय हो 🙏🙏🙏🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹

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