साधना पथ भाग 212


देव मणि शुक्ल 
आज की खबर 

  साधकों,  मेरे आत्मीय गुरुभाई बहनों एवं प्रबुद्ध मित्रों मैं आज आपसे साधना सम्बन्धी लयबद्ध प्रायोगिक ज्ञान से सम्बन्धित बिषय पर चर्चा करने जा रहा हूं आशा करता हूँ आप मेरे कथन को समझते हुए आत्मसात करने का प्रयत्न अवश्य करेंगे ।
साधक को साधना सिद्धि के लिए अपने साधना स्तर का 
प्रारम्भिक एवं विधिवत ज्ञान होना अति आवश्यक है ठीक उतना ही जितना एक वैद्य को अपने रोगी की नाडी़ का 
पूर्ण स्पन्दित होने का ज्ञान होना होता है। 
बहुधा होता क्या है कि साधक प्रारम्भिक दीक्षा के उपरान्त ही पुस्तक एवं पत्रिकाओं से उच्यकोटि की साधनाएं चयनित कर लेता है और साधनाओं के बड़े बड़े ख्वाब स्वयं में बुनने लगता है तथा बहुत ही द्रुतगति से साधनाओं के उच्यकोटि के सोपान प्राप्त कर सिद्ध साधकों में अपने आप को चयनित कर लेना चाहता है। 
ऐसा सोचना उसका कोई अपराध भी नहीं है। प्रत्येक साधक के साथ ऐसा ही कुछ होता भी है ।
साधना एक सतत और लम्बी प्रक्रिया है गुरु के सानिध्य अथवा किसी योग्य वरिष्ठ गुरुभ्राता के सानिध्य में सम्पन्न करने की जटिल प्रायोगिक प्रक्रिया है। 
मेरा कहने का आशय यह है कि आप किसी झील या तालाब के ठहरे पानी में किसीे नाविक के सानिध्य के बिना पुस्तकीय ज्ञान से नाव चलाने का अभ्यास करके उल्टे सीधे चप्पू मारना सीख भी लिये तो क्या आप किसी नदी या समुद्र के जल में नौकायन की योग्यता प्राप्त कर लिए अथवा उस अथाह सागर के जल को बिना सानिध्य के पार कर सकेंगे ।बस यह ज्ञान का पिटारा भी कुछ ऐसा ही है।
अब हम अपने मूल विषय पर आते हैं ।  कुछ  सरलतम साधनात्म स्थितियों के माध्यम से प्रत्येक साधक की साधना का स्तर स्वयं साधक अपने द्वारा आंकलन कर सकता है कि वह किस स्तर पर है। 
 प्रथम चरण - उन साधक, शिष्यों ने पूर्ण कर लिया है ।जिन्होने प्रारम्भिक दीक्षा के बाद प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में (पाँच बजे आसन ग्रहण कर) विधिवत गुरुपूजन कर चार माला गुरुमंत्र, एक एक क्रमशः चेतनामंत्र एवं गायत्री मंत्र का जप 180 दिनों तक कर लिया है।
द्वितीय चरण -  वह साधक गण हैं जिन्होने गुरुमंत्र का सवालाख जप संकल्प लेकर पूर्णता से सम्पन्न कर दशांश हवन भी सम्पन्न कर लिया गया है। 
तृतीय चरण -  वह साधक साधिकाएं हैं जिन्होने चेतनामंत्र का सवालाख मंत्र जप संकल्प लेकर पूर्ण  किया तथा दशांश हवन सम्पन्न किया। 
चतुर्थ चरण - वह साधक साधिकाएं है जिन्होने अपने पूर्व जन्म कृत व इस जन्म कृत दोष निवारण मंत्र अनुष्ठान का संकल्प लेकर सवालाख मंत्र जप करके दशांश हवन कर अपने शरीर कोपूर्ण शुद्ध एवं आवध्य कर लिया है, किसी भी साधना को सम्पन्न करने  योग्य 
तैयार कर लिया  है ,अब वह किसी भी आसन पर दो घंटे अकंप भाव से बैठ सकते है ,साधना कर सकते है 
एक बार भोजन लेकर, पूर्ण ब्रम्हचर्य का पालन कर, भूमि शयन कर, सर्वथा मौन रहकर ,समय का पालन कर, आलस्य प्रमाद से सर्वथा दूर एकांतवास में दृढ़तापूर्वक साधना कर सकते हैं और साधना की गम्भीरता और मर्म को समझ सकते हैं। 
पंचम चरण -   वह सौभाग्य शाली साधक हैं जिन्होने सद्गुरु प्रदत्त साफल्य मंत्र शिद्ध कर साधना संपन्न कर हवन आहुतियां सम्पन्न कर ली। यानि अब मंत्र साधना की सफलता की चाबी 99%गुरुदेव से प्राप्त कर साधना के साधकत्व पथ पर अग्रसर होने के लिए संकल्प वध्य हैं ,किसी भी साधना में पूर्ण सफलता प्राप्त करने के संकल्पित हैं। 
षष्ठम चरण और अन्तिम चरण- वे साधक हैं जिन्होने जीवन पूर्ति यंत्र के माध्यम से इक्कीस आहुतियां क्रमशः पांच बार सम्पन्न कर 108आहुतिया प्रदान कर सद्गुरु और मां भगवती को प्रसन्न कर लिया है तथा उनके द्वारा प्रदत्त समस्त ज्ञान को आत्मसात कर मन वचन कर्म से सद्गुरुदेव में पूर्ण निष्ठा और समर्पण भाव का संचार कर अपने आप को गुरुमय अर्थात गुरु से एकाकार होने की क्रिया सम्पन्न कर ली है किसी भी साधना में पूर्ण सफलता प्राप्त करने हेतु  100%की पकड़ मजबूत कर ली है,वो चाहे महाविद्या साधना हो या तंत्र विद्या साधना हो, अथवा अन्य इतर लोक की कोई साधना पद्धति हो, वाम मार्गी साधना हो, श्मशान साधना हो ,सद्गुरु के आशीर्वाद से कृपा प्राप्त कर उसके लिए  कुछ भी कठिन, अप्राप्य और असम्भव नहीं रह जाता है। 
अस्तु मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि सभी साधक नये, पुराने गुरुभाई बहन,अपने गुरु से दीक्षित शिष्य   बिना झिझक के बिना किसी हीन भावना के सानन्द साधना के पथ पर अपने गुरु पर अटूट श्रद्धा विश्वास और समर्पण के साथ अपने अग्रज अपने गुरु का सानिध्य प्राप्त कर उनकी सानिध्यता में उनके चरणों में प्रणिपात होकर , उनके चरणों पर अपना सर रखकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त कर कोई भी साधना संपन्न करें ,पूर्ण सफलता प्राप्त होती ही है, इसमें कोई दो राय नहीं है कोई शंसय नहीं है।
कबीर ने कहा है कि -
साधो यह घर प्रेम का , खाला  का घर नाहिं ।
शीश उतारे  भुँइ  धरे , तब  पैठे  घर  माँहि  ।।

मीरा ने कहा है कि -
जो मैं ऐसो जानती  ,प्रेम किए दुःख होय। 
नगर ढिंढोरा पीटती , प्रेम न करियो  कोय।। 

और मैं कहता हूँ कि
गुरु का जपना सरल है ,संग चले मति भंग  ।
गुरू सानिध्य सुवास है  ,महक उठे सब अंग ।।

हम आपके सुन्दर शौभाग्य की आकांक्षा रखते हुए हृदय से आपको साधुवाद प्रदान करते हैं कि आप साधना पथ पर अग्रसर होकर, उच्चकोटि की साधनाओं को सम्पन्न कर सफलता प्राप्त कर सिद्धाश्रम गमन कर सकें अपने गुरुदेव इष्ट देव के दर्शन कर सकें जो आपका लक्ष्य है कि जो आपका अभीष्ट हैऔर वह सब कुछ प्राप्त कर सकें जो आपका ध्येय है आपके प्रति मेरा ऐसा ही चिंतन है।

टिप्पणियाँ

  1. सननातनन धर्मियों के लिए ही नहीं सम्पूर्ण मानवता के लिए सुंदर संदेश है

    जवाब देंहटाएं
  2. ऐसे ही हम लोगो का मार्ग दर्शन करते रहें, जय गुरुदेव, 🙏🙏🙏🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹

    जवाब देंहटाएं
  3. ऐसे ही मार्ग दर्शन कराते रहें 🙏🙏🙏🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बी डी इंटरनेशनल स्कूल में दसवीं के छात्रों की विदाई समारोह सम्पन्न

यमुना नदी डूब क्षेत्र के जरूरतमंदों के लिए नेकी का डब्बा फाउंडेशन का सहयोगी अभियान सफल

पाकेट 7 सेक्टर 82 में कुत्तों का आतंक