आधुनिकता मे हकीकत से दूर जिन्दगी
श्रीमती संतोष सिह
आज की खबर
आज सुबह "दौड़ते" हुए,एक व्यक्ति को देखा।
मुझ से आधा "किलोमीटर" आगे था।*अंदाज़ा लगाया कि, मुझ से थोड़ा "धीरे" ही भाग रहा था।
एक अजीब सी "खुशी" मिली।
मैं पकड़ लूंगी उसे,यकीन था।
मैं तेज़ और तेज़ दौड़ने लगी।
आगे बढ़ते हर कदम के साथ,
मैं उसके "करीब" पहुंच रही थी।
कुछ ही पलों में,
मैं उससे बस सौ क़दम पीछे थी।
निर्णय ले लिया था कि, मुझे उसे "पीछे" छोड़ना है। थोड़ी "गति" बढ़ाई।
अंततः कर दिया।
उसके पास पहुंच,
उससे "आगे" निकल गई।
"आंतरिक हर्ष" की "अनुभूति" हुयी, कि, मैंने उसे "हरा" दिया।
बेशक उसे नहीं पता था,कि हम "दौड़" लगा रहे थे।
मैं जब उससे "आगे" निकल गयी,
"एहसास" हुआ कि दिलो-दिमाग "प्रतिस्पर्धा" पर, इस कद्र केंद्रित था.......कि घर का मोड़" छूट गया,
मन का "सकून" खो गया,
आस-पास की "खूबसूरती और हरियाली" नहीं देख पाई,
दौड़ पर ध्यान लगाने में अपनी "खुशी" को भूल गई, और
तब "समझ" में आया*
यही तो होता है "जीवन" में,
जब हम अपने साथियों को,
पड़ोसियों को, दोस्तों को,
परिवार के सदस्यों को,
"प्रतियोगी" समझते हैं।
उनसे "बेहतर" करना चाहती हैं।
प्रमाणित" करना चाहती हैं
कि, हम उनसे अधिक "सफल" हैं।
या अधिक "महत्वपूर्ण"।
यह बहुत "महंगा" पड़ता है,
क्योंकि अपनी "खुशी भूल" जाती हैं।
अपना "समय"और "ऊर्जा"
उनके "पीछे भागने" *में गॅंवा देती हैं। इस सब में, अपना "मार्ग और मंज़िल" भूल जाती हैं।
"भूल" जाती हैं कि, "नकारात्मक प्रतिस्पर्धाएं" कभी ख़त्म नहीं होंगी।
हमेशा" कोई आगे होगा।
किसी के पास "बेहतर नौकरी" होगी।
"बेहतर गाड़ी",
बैंक में अधिक "रुपए",
ज़्यादा संस्कारी बच्चे,
बेहतर "परिस्थितियां"
और बेहतर "हालात"।
इस सब में एक "एहसास" ज़रूरी है कि, बिना प्रतियोगिता किए, हर इंसान "श्रेष्ठतम" हो सकता है।
इस कदर "असुरक्षित" महसूस करती हैं कुछ बहने है कि, अत्याधिक "ध्यान" देती हैं दूसरों पर ,कहां जा रही हैं?क्या कर रही हैं?क्या पहन रही हैं?क्या बातें कर रही हैं?
"जो है, उसी में खुश रहो"।
लंबाई, वज़न या व्यक्तित्व।
स्वीकार" करो और "समझो
कि, कितने भाग्यशाली हो।
ध्यान नियंत्रित रखो।
स्वस्थ, सुखद ज़िन्दगी जीओ।
भाग्य" में कोई "प्रतिस्पर्धा" नहीं है।सबका अपना-अपना है।
तुलना और प्रतियोगिता हर खुशी को चुरा लेते हैं।
अपनी शर्तों पर जीने का आनंद छीन लेते हैं।
इस लिए अपनी दौड़ खुद लगाओ, बिना किसी प्रतिस्पर्धा के, इससे असीम सुख - आनंद मिलेगा, मन में विकार नहीं पैदा होगा, शायद इसी को मोक्ष कहते हैं,,,,,
बहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया
हटाएंNaksh
जवाब देंहटाएंVery nice thought 👍
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