साधना पथ भाग 214

देव मणि शुक्ल 
आज की खबर 


  साधकों  मेरे आत्मीय गुरु भाई बहनों एवं सभेच्छु साधकों आप लोग प्रबुद्ध हैं समझदार हैं। प्रत्येक स्थिति के मर्म को समझने में सक्षम हैं मेरे कथन का आशय भी समझने में कुशल हैं मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि फिर भी आप साधनाओं के विषय में इतना निष्क्रिय और सुस्त क्यों हैं।
मैं पिछले दो सालों से आपके मध्य साधना सम्बंधी लेखों  ,पुस्तको के माध्यम से बराबर आपके साथ हूं आप की प्रत्येक छोटी बड़ी समस्याओं के समाधान का सहभागी रहता हूं कभी भी किसी भी समय आपका आदेश मुझे प्राप्त होता है मैं तत्काल किसी न किसी माध्यम से आपके साथ  तत्पर रहता हूं सिर्फ इसलिए कि आप मुझे अपना समझते हो और जब आप मुझे अपना समझते हो तो आप की प्रत्येक बात को मैं धैर्य पूर्वक सुनकर यथासंभव
उचित समाधान भी करता  हूं और जो नही कर पाता हूँ अपने परम पूज्य गुरुदेव जी के समक्ष रखता हूँ और वहां से आपकी समस्याओं का समाधान होता है। 
कई बार मुझे आपकी उदासीनता देखकर आश्चर्य होता है कि आप वास्तव में साधनाएं करना चाहते भी हैं या यूं ही दीक्षा लेकर बस खानापूर्ति कर रहे है। 
निंदा , आलोचना और अपने मन की व्यथा कहना दोनों में जमीन आसमान का फ़र्क है उसे मैं भी बखूबी समझता हूं ।इन सबके उपरांत भी मैं आपको अपने लेखन के माध्यम से नर्सरी केजी के बच्चे की तरह एक एक बात को, साधनात्मक पहलुओं को अपने धैर्य और क्षमता के अनुरूप समझाने का भरसक प्रयत्न करता हूं ।
इसलिए नहीं कि मै बहुत बडा ग्यानी हूँ। बस मेरा यह स्वभाव है। और इसलिए कि मैं किसी प्रकार अपने पूज्य गुरुदेव का ॠण कुछ अंशों में ही सही उतार सकूं उनके कार्य को आप के माध्यम से सम्पादित करवाकर कुछ पुण्य प्रसून अर्जित कर गुरु चरणों में चढ़ा सकूं।                  आखिर आप कब समझेंगे कि दीक्षांओं के माध्यम से साधनाएं सम्पन्न नहीं हुआ करती दीक्षा तो एक मात्र विधान है शरीर रूपी बर्तन को बार बार मांजने का ,अंदर बाहर चमकाने का ,दीक्षाएं लो सौ बार ल़ो, हजार बार लो , बर्तन को जितना अधिक मांजोगे उतना ही शुद्ध साफ चमकदार होगा ,स्वर्ण पात्र बनेगा ।यह सत्य है लेकिन खाली बर्तन की पात्रता भी क्या ? जब तक उसमें अमृत स्वरूप गुरु चरणामृत न भरा जाये ।
और वह अमृत घट आप बन सकते हैं साधनाओं के माध्यम से और उच्च कोटि की साधनाओं के माध्यम से इसके लिए मैं आपको साधना सम्बंधी सामग्री भेजता  रहता  हूं । जो कुछ परम पूज्य गुरुदेव जी से प्राप्त करता हूँ  । वह लेख के रूप में आपकी सेवा के लिए अर्पण करता हूँ। 
 कब हरी झंडी मिले और कब गाड़ी रवाना हो जाये , यूं समझिए कि प्लेट फार्म छोड़ कर आउटर पर खड़ी है ।और ऐसा भी नहीं है कि हवा से सामग्री प्राप्त कर आपको आवंटित करता हूं  बस एक जुनून है साधनाओं का ,इस साधनात्मक ज्ञान को आपके साथ शीघ्र अति शीघ्र शेयर करने का ,इस खजाने को आप पर लुटाने का और आप हैं कि ? आखिर कब समझेंगे मेरी बात को ??

का वर्षा जब कृषी सुखाने ,समय चूंकि पुनि का पछिताने!

मैं लेख  के माध्यम से साधना में सफलता और असफलता के सभी बिन्दुओं को समझाने का अथक प्रयास किया है और आगाह भी कर देना चाहता हूं कि सत्य और समय कभी किसी के रोके नहीं रुका है यह मुठ्ठी की सूखी रेत के समान है आप इसको जितना कस कर पकड़ने का प्रयास करोगे उतनी ही तेजी से फिसलती जायेगी और अंत में जब मुट्ठी खोलकर देखोगे तो उसमें कुछ नहीं होगा खाली की खाली नजर आयेंगी । यही इस नाशवान शरीर और इस एक अंश जीवन का सार है।
इसलिए मैं प्रयास रत हूं कि यह गुरु से दीक्षित स्वर्ण पात्र खाली न रहने पाए ,इनमें जमा कंकड़ पत्थर कूड़ा कचरा निकाल कर स्वर्ण मुद्राओं, हीरे मोती , मणि रूपी गुरु ज्ञान  से कंठ तक भरा जा सके ।
वस्तुत: मेरा कहने का अभिप्राय यही है कि रोजमर्रा जीवन में काम आने वाले छोटे छोटे प्रयोगों से लेकर उच्च कोटि की महाविद्या साधनाएं भी सम्पन्न करें और उनमें सफ़लता भी प्राप्त करें , मैं मानता हूं कि साधक की स्टेज़ के अनुरूप ही साधनाओं में सफलता प्राप्त होती है लेकिन स्टेज भी अभ्यास करने से ही ऊंचाई पर स्थित हो सकेंगी । कुछ करने से ही कुछ होगा ,चलने से ही मंजिल मिलेगी ।एक एक सीढ़ी चढ़ कर ही पहाड़ पर चढ़ा जा सकता है , कठिन अवश्य है परन्तु असम्भव कदापि नहीं ।परम पूज्य गुरुदेव ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि यदि आप सिद्धाश्रम के अनुगामी होना चाहते हैं तो इस नाशवान
शरीर के माध्यम से प्रत्येक साधक शिष्य को दो महाविद्याएं अवश्य ही सिद्ध होनी चाहिए जैसा कि उस तपोभूमि का नियम है और वहां प्रवेश पाने के लिए तपस्वीगण अपना पूरा पूरा जीवन हिमालय की कंदराओं में,बर्फीली पहाड़ियों में तिल तिल कर गला देते हैं और एक आप है ।जरा सोचिए। 
मैं आपको यहां यह भी रहस्योद्घटन कर देना चाहता हूं कि आप इसी जन्म में साधनाएं नहीं कर रहे हो आप नये नये साधक भी नहीं हो ,पूर्व स्थिति में जहां तक आपने साधनाएं सम्पन्न की उसके आगे की  कड़ी में पुनः आप प्रयास रत हैं और यदि आप कठिन अथक परिश्रम के साथ कष्ट पीड़ा को दरकिनार करते हुए सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं तो यह आपका आपाधापी का अंतिम जीवन होगा आगे आप सिद्धाश्रम से पूज्य गुरुदेव के निर्देशानुसार ही पृथ्वी लोक अथवा अन्य किसी लोकों में जन्म लेने के अधिकारी होंगे ।
साधना पथ नितांत धैर्य साहस जीवट के साथ शनै: शनै: मंद गति से पथ पर रुकावट और बाधाओं को पार करते हुए अपने गंतव्य अपनी मंजिल को पा लेना ही जीवन की पूर्णता सफ़लता है और अपने गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा समर्पण औरविश्वास का ही दूसरा नाम साधना की सफलता है जय सदगुरुदेव। मेरे विचार और मेरा हृदय का भाव ही आपका प्रत्यक्ष मार्ग दर्शक सिद्ध हो , परमपूज्य गुरुदेव  आपको साधनाओं में सफलता एवं सिद्धि प्रदान कर आपके जीवन का मार्ग प्रशस्त करें ऐसी ही मेरी कामना है।

टिप्पणियाँ

  1. साधना एक ऐसा विन्दु है जो आत्मा को निर्मल कर परमात्मा का साक्षातकार कराता है | लेखक का प्रयास सराहनीय व लोकोपकारी है |

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  2. उत्तर
    1. आप सभी की प्रेरणा से ही कुछ लिख पाता हूँ

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  3. उत्तर
    1. परम पूज्य गुरुदेव जी की कृपा ऐसी ही हमारे और आप सभी पर बनी रहे

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  4. जय गुरुदेव 🕉🕉🕉🕉🕉🙏🙏🙏🙏🙏

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