साधना पथ भाग 217

देव मणि शुक्ल 
आज की खबर 

  साधकों  हमारे भारत वर्ष की संस्कृति ऋषि और कृषि प्रधान रही है। समग्र प्राणियों में ईश्वर के दर्शन करने तथा भाव से संबंध बनाए रखने के कारण ही हमारा विश्व बंधुत्व का संदेश भी रहा है। देश धर्म और समाज जब-जब नाना प्रकार की परेशानियों में रहा तब-तब संत महापुरुषों ने अपने कर्तृत्व द्वारा उससे राहत दिलाई एवं नई दिशा दी।
 *गोस्वामी तुलसीदास* जी ने रामभक्ति के द्वारा न केवल अपना ही जीवन कृतार्थ किया वरन्‌ समूची मानव जाति को श्रीराम के आदर्शों से जोड़ दिया। आज समूचे विश्व में श्रीराम का चरित्र उन लोगों के लिए आदर्श बन चुका है जो समाज में मर्यादित जीवन का शंखनाद करना चाहते हैं।

*संवत 1554 में जागा राजापुर का भाग ।*
*हुलसी ने तुलसी को जाया जो हिन्दी के अमर सुहाग ।।*

 संवद् 1554 को श्रावण शुक्ल पक्ष की सप्तमी को इस धरा धरातल पर अवतरित होकर गोस्वामी बाबा ने सगुण भक्ति की रामभक्ति धारा को ऐसा प्रवाहित किया कि आज गोस्वामी जी राम भक्ति के पर्याय बन गए। गोस्वामी बाबा की ही देन है जो आज भारत के कोने-कोने में रामकथाओ के माध्यम से जन जागरण का भाव चल रहा है । कई संत , सद्गृहस्थ रामकथा के माध्यम से समाज को जागृत करने में सतत्‌ लगे हुए हैं। ये गोस्वामी बाबा की ही महिमा है कि हम जैसे मूर्ख भी थोड़ा बहुत श्रीराम जी का गुणगान कर सकते हैं । 
 भगवान वाल्मीकि की अनूठी रचना 'रामायण' को आधार मानकर गोस्वामी तुलसीदास ने लोक भाषा में रामकथा की मंदाकिनी इस प्रकार प्रवाहित की कि आज मानव जाति उस ज्ञान मंदाकिनी में गोते लगाकर धन्य हो रही है।
 साधकों  -- गोस्वामी बाबा का मत है कि इंसान का जैसा संग साथ होगा उसका आचरण व्यवहार तथा व्यक्तित्व भी वैसा ही होगा, क्योंकि संगत का असर देर सवेर अप्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष, चेतन व अवचेतन मन एवं जीवन पर अवश्य पड़ता है। इसलिए हमें सोच-समझकर अपने मित्र बनाने चाहिए। सत्संग की महिमा अगोचर नहीं है अर्थात्‌ यह सर्वविदित है कि सत्संग के प्रभाव से कौआ कोयल बन जाता है तथा बगुला हंस। सत्संग का प्रभाव व्यापक है, इसकी महिमा किसी से छिपी नहीं है।
 
बिनु सतसंग बिबेक न होई।राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।

 गोस्वामी बाबा का कथन है कि सत्संग संतों का संग किए बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती और सत्संग तभी मिलता है जब ईश्वर की कृपा होती है। यह तो आनंद व कल्याण का मुख्य हेतु है। साधन तो मात्र पुष्प की भांति है। संसार रूपी वृक्ष में यदि फल हैं तो वह सत्संग है। अन्य सभी साधन पुष्प की भांति निरर्थक हैं। फल से ही उदर पूर्ति संभव है न कि पुष्प से।
 
उपजहिं एक संग जग माहीं।जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं।
सुधा सुरा सम साधु असाधू।जनक एक जग जलधि अगाधू।

 संत और असंत दोनों ही इस संसार में एक साथ जन्म लेते हैं लेकिन कमल व जोंक की भांति दोनों के गुण भिन्न होते हैं। कमल व जोंक जल में ही उत्पन्न होते हैं लेकिन कमल का दर्शन परम सुखकारी होता है जबकि जोंक देह से चिपक जाए तो रक्त को सोखती है। उसी प्रकार संत इस संसार से उबारने वाले होते हैं और असंत कुमार्ग पर धकेलने वाले। संत जहां अमृत की धारा हैं तो असंत मदिरा की शाला हैं। जबकि दोनों ही संसार रूपी इस समुद्र में उत्पन्न होते हैं।
 
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पथ परिहरि बारि बिकार।

 सृष्टि रचयिता विधाता ने इस जड़ चेतन की समूह रूपी सृष्टि का निर्माण गुण व दोषों से किया है। लेकिन संतरूपी हंस दोष जल का परित्याग कर गुणरूपी दुग्ध का ही पान किया करते हैं। गोस्वामी बाबा ने सम्पूर्ण मानव जाति को अपने ग्रंथ के माध्यम से एक आदर्श समाज , परिवार , जीवन जीने की कला का ज्ञान कराया है । वास्तव में यदि हम बाबा जी के बताए मार्ग पर किंचित मात्र भी चल सके तो निश्चय ही हमारा जीवन कृतार्थ हो सकता है ।

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