साधना पथ 220

देव मणि शुक्ल 
आज की खबर 
                                                                
  साधकों  एक दिन (संध्या के समय) सरयू के तट पर तीनों भाइयों संग टहलते श्री राम से भरत भैया ने कहा , "एक बात पूछूँ" ? भईया!! 
माता कैकई ने आपको वनवास दिलाने के लिए मँथरा के साथ मिल कर जो 'षड्यंत्र' किया था , क्या वह राजद्रोह नहीं था ?
उनके 'षड्यंत्र' के कारण एक ओर राज्य के भावी महाराज और महारानी को (14) चौदह वर्ष का वनवास झेलना पड़ा तो दूसरी ओर पिता महाराज की दु:खद मृत्यु हुई ।  ऐसे 'षड्यंत्र' के लिए (सामान्य नियमों के अनुसार) तो मृत्युदण्ड दिया जाता है , फिर आपने माता कैकई को दण्ड क्यों नहीं दिया ?
राम मुस्कुराए बोले,  "जानते हो भरत !!  किसी कुल में एक चरित्रवान और धर्मपरायण पुत्र जन्म ले ले , तो उसका जीवन उसके असँख्य पीढ़ी के पितरों के अपराधों का प्रायश्चित कर देता है । जिस माँ ने तुम जैसे - महात्मा को जन्म दिया हो , उसे दण्ड कैसे दिया जा सकता है भरत ?"
(भरत सन्तुष्ट नहीं हुए)
कहा , "यह तो मोह है भईया ; और "राजा_ का_ दण्डविधान" मोह से मुक्त होता है । कृपया एक राजा की तरह उत्तर दीजिये कि आपने माता को दण्ड क्यों नहीं दिया ? समझिए कि आपसे यह प्रश्न आपका अनुज नहीं , अयोध्या का एक सामान्य नागरिक कर रहा है ।
(राम गम्भीर हो गए) कुछ क्षण के मौन के बाद कहा , "अपने सगे-सम्बन्धियों के किसी अपराध पर कोई दण्ड न देना ही इस सृष्टि का 'कठोरतम दण्ड' है भरत !!”
माता कैकई ने अपनी एक भूल का बड़ा - कठोर दण्ड भोगा है । वनवास के (14) चौदह वर्षों में हम - चारों भाई अपने - अपने स्थान से परिस्थितियों से लड़ते रहे हैं ;  पर माता कैकई हर क्षण मरती रही हैं । 
 (अपनी एक भूल के कारण)  उन्होंने अपना पति खोया , अपने चार - बेटे खोए , अपना समस्त सुख - सम्मान खोया, फिर भी वे उस "अपराध - बोध" से कभी मुक्त न हो सकीं । वनवास समाप्त हो गया तो परिवार के शेष - सदस्य प्रसन्न और सुखी हो गए  ;  पर वे कभी प्रसन्न न हो सकीं । कोई 'राजा'  किसी "स्त्री" को इससे कठोर - दण्ड क्या दे सकता है  ?
मैं तो सदैव यह सोचकर दुखी हो जाता हूँ कि  "मेरे कारण (अनायास ही)  मेरी माँ को इतना कठोर - दण्ड भोगना पड़ा ।"
राम के नेत्रों में जल उतर आया था , और भरत - आदि भाई मौन हो गए थे ।
(राम ने फिर कहा)और उनकी भूल को अपराध समझना ही क्यों भरत ।[यदि मेरा वनवास न हुआ होता] ,  तो संसार भरत' और 'लक्ष्मण'  जैसे भाइयों के अतुल्य भ्रातृ - प्रेम को कैसे देख पाता ?  (मैंने) तो केवल अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन मात्र किया था , पर (तुम - दोनों) ने तो मेरे - स्नेह में (14) चौदह वर्ष का वनवास भोगा । वनवास न होता तो यह संसार सीखता कैसे कि भाइयों का सम्बन्ध होता कैसा है ?" भरत के प्रश्न मौन हो गए थे । (वे अनायास ही बड़े भाई से लिपट गए) !!
राम कोई नारा नहीं हैं । राम एक   आचरण हैं , एक चरित्र हैं , एक जीवन "जीने की शैली" हैं । ( मनन अवश्य करें  )

टिप्पणियाँ

  1. प्रेरणास्रोत लेखन

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  2. जय श्री राम 🙏🙏🙏🙏🙏

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