गया तीर्थ की महिमा
आज की खबर
आचार्य श्रीकांत पाण्डेय
गाजियाबाद
ब्रह्मा जी जब सृष्टि की रचना कर रहे थे, उस दौरान उनसे असुर कुल में गया नामक असुर की रचना हो गई। गयासुर असुरों की संतान के रूप में पैदा नहीं हुआ था, इसलिए उसमें आसुरी प्रवृत्ति नहीं थी। वह देवताओं का सम्मान और उनकी आराधना करता था। उसके मन में एक खटका था; वह सोचा करता था, कि भले ही वह संत प्रवृत्ति का है, लेकिन असुर कुल में पैदा होने के कारण उसे कभी भी सम्मान नहीं मिलेगा! इसलिए क्यों ना अच्छे अच्छे कर्म करके इतना पुण्य अर्जित किया जाए ताकि उसे स्वर्ग मिले!
गयासुर ने कठोर तप से भगवान विष्णु को प्रसन्न किया; भगवान से वरदान मांगते समय उसने कहा कि "आप मेरे शरीर में वास करें, जो कोई मुझे देखें उसके सारे पाप नष्ट हो जाए ! उस जीवात्मा को स्वर्ग में स्थान मिले। भगवान से वरदान पाकर गयासुर घूम घूम कर लोगों के पाप दूर करने लगा। जो भी उसे देख लेता, उसके पाप नष्ट हो जाते। और वह स्वर्ग का अधिकारी हो जाता। इससे यमराज की व्यवस्था गड़बड़ा गई कोई घोर पापी भी कभी गयासुर के दर्शन कर लेता, तो उसके पाप नष्ट हो जाते। यमराज उसे नर्क भेजने की तैयारी करते तो वह गयासुर के दर्शन के प्रभाव से स्वर्ग में चला जाता। यमराज ने ब्रह्मा जी से कहा कि अगर गयासुर को न रोका गया तो आप का विधान ही समाप्त हो जाएगा। जिसमें आपने सभी को उसके कर्मों के अनुसार फल भोगने की व्यवस्था दी है।
ब्रह्मा जी ने उपाय निकाला, उन्होंने गयासुर से कहा कि तुम्हारा शरीर सबसे ज्यादा पवित्र है। इसलिए तुम्हारी पीठ पर बैठकर, मैं सभी देवताओं के साथ यज्ञ करूंगा। उसकी पीठ पर यज्ञ होगा ! यह सुनकर गयासुर सहर्ष तैयार हो गया। ब्रह्मा जी सभी देवताओं के साथ पत्थर से गयासुर को दबा कर बैठ गए। इतने भार के बावजूद भी वह स्थिर नहीं हुआ। वह घूमने फिरने में फिर भी समर्थ था।
देवताओं को चिंता हुई उन्होंने आपस में सलाह की, कि इसे श्री विष्णु ने वरदान दिया है, इसलिए अगर स्वयं श्री हरि देवताओं के साथ इसके ऊपर बैठ जाए तो गयासुर अचल हो जाएगा। अतः श्रीहरि भी उसके शरीर पर आकर बैठ गए। श्री विष्णु जी को भी सभी देवताओं के साथ अपने शरीर पर बैठा देखकर गयासुर ने कहा कि "आप सब और मेरे आराध्य श्री हरि की मर्यादा के लिए अब मैं अचल हो रहा हूं! घूम घूम कर लोगों के पाप हरने का कार्य बंद कर दूंगा! लेकिन मुझे श्रीहरि का जो आशीर्वाद है, वह व्यर्थ नहीं जा सकता। इसीलिए श्रीहरि आप मुझे पत्थर की शिला बना दें, और यही स्थापित कर दें। श्रीहरि उसकी इस भावना से बड़े खुश हुए उन्होंने गयासुर से कहा कि "अगर तुम्हारी कोई और इच्छा हो तो मुझसे वरदान के रूप में मांग लो ! गयासुर ने कहा कि "मेरी इच्छा है कि आप सभी देवताओं के साथ अप्रत्यक्ष रूप से इसी शिला पर विराजमान रहें। और यह स्थान मृत्यु के बाद किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के लिए तीर्थ स्थल बन जाए। श्री विष्णु ने तथास्तु कहा, और सभी देवता इस कल्याणकारी भावना से खुश हुए, और श्री हरि ने उसको आशीर्वाद दिया कि "जहां गयासुर स्थापित हुआ है, वहां पितरों के श्राद्ध तर्पण आदि करने से मृत आत्माओं को पीड़ा से मुक्ति मिलेगी। इस क्षेत्र का नाम गयासुर के नाम से गयाजी तीर्थ विख्यात होगा। मैं स्वयं यहां विराजमान रहूंगा।
इतना कहकर श्री विष्णु जी ने अपने पैर का निशान वहां पर स्थापित किया, जो आज भी वहां के मंदिर में दर्शनीय है। आज भी पितरों का श्राद्ध फल्गु नदी के तट पर विष्णुपद मंदिर में, अक्षयवट के नीचे किया जाता है। वह स्थान बिहार के गयाजी में हुआ। जहां श्राद्ध आदि करने से पितरों का कल्याण होता है, और उन्हें मुक्ति प्राप्त होकर भगवान श्री हरि के धाम में स्थान मिलता है।
Nice
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
जवाब देंहटाएं🙏🙏🙏
जवाब देंहटाएंजानकारी लोक कल्याणकारी
जवाब देंहटाएंआभार
हटाएंJai shree radhe
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
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