भागवत की कथा जीवन की मुक्ति के लिए नहीं अपितु जीवन जीने की युक्ति के लिए है- आचार्य देव व्रत जी महाराज
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विश्व नाथ त्रिपाठी
ब्यूरो प्रभारी प्रतापगढ़
नोएडा वर्तमान समय मे मानव भ्रमित है,वह यह नहीं समझ पा रहा है कि मानव जीवन का अर्थ क्या है , भगवान ने हमें इस परोपकारी व आत्मशुद्धि शरीर को क्यों दिया उक्त विचार श्रीमद् भागवत कथा के मर्मज्ञ प्रख्यात कथाकार बाल शुक आचार्य देवव्रत महाराज जी ने जनपद के कुंडा तहसील में पंडित राजाराम पांडेय के घर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह के पंचम दिवस पर व्यक्त किया ।
पूज्य आचार्य जी ने कहा कि परीक्षित को तो भगवान का दर्शन गर्भ में ही हो चुका था ,व उसी क्षण मोक्ष को प्रप्त हो चुके थे लेकिन जगत में सप्ताह ज्ञान ज्ञय तो व्यक्ति को जीने की युक्ति भी बताती है लेकिन आज का मानव कथा तो सुनता है उसे क्षणिक वैराग्य का भी अनुभव होता है लेकिन सांसारिक माया अज्ञान के कारण वहपुन: भ्रमित हो कर माया के जाल में फंसे कर कोल्हू का बैल बन कर रह जाता है । वह दया ,धर्म ,शौच त्याग आदि से बहुत दूर हो चुका है ।शास्त्र वेद पुराण सभी मानव को मानव बनने का उपदेश देते हैं जिसमें अपनी सभ्यता , संस्कृति व संस्कार को सुरक्षित रखते हूं परमात्मा का सानिध्य प्राप्त करना होता है । यह सानिध्य तभी सम्भव है जब योग्य गुरू शास्त्रानुकूल आपको जीने की कला की शिक्षा दे । जीवन में यदि परमात्मा से दूरी बन गयी तो जीने व जीवन का कोई महत्व नहीं रह जाता ।
हमें सर्वप्रथम सत्संग की ओर ध्यान देना होगा ,विद्वानों द्वारा गायी जा रही कथा का श्रवण , मनन व धारण पर अपना ध्यान भी केंद्रित करना होगा । समर्पण व भक्ति के माध्यम से अपने इष्ट को पाने का प्रयास होना चाहिए । गोपियां इसी प्रेम भक्ति की प्रतीक हैं जिसके बल पर वे कान्हा से कभी अलग नहीं हुई।
भगवान कृष्ण द्वारा की गयी सभी लीलाएं हमें यही शिक्षा देती हैं ।
उत्तम
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
जवाब देंहटाएंअनमोल वचन
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