तापस वेश बिशेष उदासी, चौदह बरिस राम बनवासी

आज की खबर 
देव मणि शुक्ल 

नोएडा जी टी करनाल रोड अली पुर थाना के प्राचीन शिव मंदिर पर चल रही भव्य श्री राम कथा के छठे दिन राम वनवास की मार्मिक कथा का वर्णन हुआ। 
कथा व्यास अनंत श्री विभूषित महामंडलेश्वर श्री श्री 1008 स्वामी पंचमानंद जी महाराज ने कहा कि जब कैकयी कोप भवन मे चली जाती है और महाराजा दशरथ वहां पहुंच कर उनकी ऐसी दीन हीन दशा देखते हैं तो रानी कैकयी से बडे विनम्रता के साथ पूछते हैं कि हे महारानी आपकी ऐसी दशा का कारण क्या है। राजा के बार बार पूछने पर महारानी कैकयी ने पहले महाराज को राम की शपथ दिलाई और फिर आश्वस्त होकर कहा कि पूर्व में आपने मुझे दो वर दिया था।आज वह वरदान मुझे दे दीजिए। राजा दशरथ जी ने कहा कि आप बस इतनी सी बात पर नाराज हो। मै सहर्ष देने के लिए तैयार हूँ। आप मागिए। 
तब महारानी ने कहा कि-
सुनह प्रान प्रिय भावत जी का। देहूं एक बार भरतहि टीका।। मांगहु दूसर वर कर जोरी।
 पूरवहु नाथ मनोरथ मोरी।। तापस वेश विशेष उदासी।
 चौदह  बरिस राम वनवासी।।

इतना सुनते ही महाराज दशरथ सहम गये। राजा के चेहरे का रंग  उड़ गया राजा सिर को पकड़ कर बैठ गये। उनके नेत्रों के सामने अंधेरा छा गया।
महाराज दशरथ अपने आप सम्हालते हुए कहा कि रानी पहला वर हम आपका स्वीकार करते हैं लेकिन दूसरा यह असहनीय पीड़ा है।राम को अपने से अलग नहीं कर सकते।
बार बार समझाने के बाद भी कैकयी नहीं मानती है ।
यह ख़बर आग की तरह पूरी अयोध्या में फैल गई। पूरे नगर मे  शोक छा गया। कोई यकीन ही नहीं कर पा रहे है। 

राम राम रट बिकल भूआलू। जनु बिनु  पंख विहंग बेहालू।।

कथाव्यास आगे की कथा कहते हुए कहते हैं कि राम लखन और माता जानकी तीनों लोग बल्कल बस्त्र पहन कर माताओ से प्रणाम कर वन गमन के लिए निकल पड़ते है और  प्रयागराज मे मुनि भारद्वाज के आश्रम में ठहरते हैं और सुबह चित्रकूट के लिए प्रस्थान कर देते हैं। इधर भरत शत्रुघ्न को गुरू आदेश द्वारा ननिहाल से वापस आने के लिए कहा जाता है। इसके पश्चात आरती एवं प्रसाद वितरण किया। कथा पंडाल मे भक्त भाव बिभोर हो कर कथा का रसास्वादन लेते हुए धर्म लाभ अर्जित कर रहे है। यह कथा रोज दोपहर 1:30 बजे से शाम 5 बजे तक चल रही है।

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