मेरे मन की बात मेरी कलम से.... 'कसक'




आज की खबर
देव मणि शुक्ल 

शाम का समय था, अपनी शॉप पर बैठी थी आज कई दिनों के बाद शॉप मे आयी थी
अचानक दो बच्चे आए शॉप पर वो बच्चे अजनबी नहीं थे मेरे लिए 
वो स्लम के बच्चे थे
6-7 बच्चे रोजाना आते थे मेरे पास, पर आज दो बच्चे ही आए 
आते ही बोलने लगे...
आंटी आंटी वो जो रमन है ना..
मैंने  बिना पूरी बात सुने, घबराते हुए कहा....
अरे.... क्या हुआ रमन को...!
आंटी वो कुछ दिनों से दिखाई नहीं दे रहा उन बच्चों ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा...
ऐसे कैसे खो गया वो...?
रमन मात्र 9 साल का है और रमन के घर के हालात अन्य बच्चों से अलग थे बिन बाप का बच्चा, बीमार माँ, जो घरों मे काम कर के गुजारा कर रही थी
उपर से 6 भाई बहन, इसलिए मेरा चौंकना लाजिमी था

नहीं आंटी वो खोया नहीं है...
उनका पूरा परिवार ना जाने कहाँ चला गया....?
..बच्चों की बातें सुन कर मेरे दिल और घबरा गया....मैं अपनी सीट से खड़ी हो गई
लेकिन दिल दिमाग मे तो मेरे जोरों का तूफान उमड़ने लगा
 बच्चे आगे क्या बोल रहे थे, मुझे सुनना बंद हो गया 
अपने धड़कनों की आवाजें मेरे कानों मे सुनायी पड़ने लगी...
चलचित्र की तरह रमन का मासूम चेहरा सामने आने लगा
रोज  शॉप मे स्लम के बच्चे मुझसे मिलने आते थे
जब भी मैं बीमार पड़ती थी तो, ये सभी बच्चे सड़क क्रॉस करके मेरे घर पहुंच जाते थे, एक दिन सभी को डाँटा की घर मत आओ, घर आते थे इसलिए नहीं...
इन्हें सड़क पार करके आना पड़ता था और मुझे डर लगा रहता था कि इनके साथ सड़क मे कोई दुर्घटना ना हो जाए 
उन्हीं मे से रमन भी था, वो बहुत ही गुमसुम रहता था

6-7 बच्चों का दाखिला एक एनजीओ के स्कूल मे कराया गया था कुछ समय पहले, क्योंकि ये सभी बच्चे स्कूल नहीं जाते थे
स्कूल मे दाखिले के बाद जब बच्चे रोज मेरे पास आते थे तो मैं रोज उनके हाल चाल पूछती थी
कौन स्कूल गया, कौन नहीं गया...?
पूछती थी
कई दिनों से रमन स्कूल नहीं जा रहा था
पूछा तो पता चला माँ बीमार है, माँ के बदले दीदी काम पर जाती है और वो अपने छोटे भाई बहनो को सम्भालता  है इसलिए वो स्कूल नहीं जा पाता... 
घर मे  बीमार माँ और 5भाई बहनो के अलावा कोई नहीं था कुल 6 भाई बहन थे कन्धे पर हर समय नोट बुक , पेंसिल बॉक्स और सेल करने के लिए लिफ़ाफ़े का मैला सा झोला  टंगा रहता था
वो बैग नहीं, जिम्मेदारियों का बोझ था उस मासूम के कन्धे पर...सब बच्चे चले जाते थे पर वो काफी देर तक मेरे पास रुका रहता था....
मेरे यहा भगवान की फोटो के सामने हाथ जोड़कर, आंखे बंद करके, कुछ बुदबुदाता था
पूछने पर बोलता था कि, मेरी मम्मी जल्दी ठीक हो जाए, ये बोला भगवान से, उसकी भोली बाते और मासूमियत भरी बातें बहुत ही प्यारी होती थी 
उसके घर की हालत देखकर मैंने सोचा कि इनके यहाँ एक महीने का राशन भरा देते है
टोटल 7 लोग है कैसे कर पाते होगे खाने रहने का प्रबंध.....?
क्योंकि उसकी माँ काफी दिनों से बीमार होकर बिस्तर पर थी, उनका कई घरों से काम भी छूट गया था. 

मैं ने रमन को बोला कल राशन दिलवा दूंगी आना कल,  दूसरे दिन रमन आया अपनी दीदी को लेकर, मैं उन्हें ले गई साथ मे लेकिन भीड़ होने की वज़ह से काफी इंतजार के बाद  परचुन की शॉप से से वापिस लौटना
पड़ा... उसकी दीदी वापस काम पर जा चुकी थी और वो भी थका थका लगा मुझे..
मुझे भी अपनी शॉप पर आना पड़ा, रमन साथ मे था
मैने उसको जाने को बोला और कहा कि कल पक्का राशन दिलवा दूंगी..
उसने बोला कोई बात नहीं आंटी.....
वो जाने लगा तो उसको मैंने जूस पीने के पैसे पकडाये
उसने बड़ी मुश्किल से पैसे पकड़े और मुझे नमस्ते कह कर निकल गया.......मुझे नहीं पता था कि, ये आखिरी मुलाकात है उससे.... 
पर आज..
ये दोनों बच्चे जो बोल रहे थे कि वो सभी परिवार  के लोग पता नहीं कहाँ चले गए....
और मैं अंदर ही अंदर घुटन महसूस करने लगी कि
"काश उन बच्चों को उस दिन राशन दिलवा दिया होता....
सच उस दिन, उस रात मैंने अपने आपको बहुत कोसा
काश मैं उनके लिए कुछ कर पाती... रात भर अश्रु धारा बहती रही आँखों से...
अगर स्याही से लिख रही होती कागज पर तो आपको दिल के जख्म , आँसू की बूँदों के रूप मे जरूर दिखाई देते.... 

पता नहीं वो सब कहाँ होगे...?
वो अकेली बीमार औरत अपने 6 मासूम बच्चों को लेकर
कहाँ भटक रही होगी....? 
. उनके साथ ऐसा क्या हुआ होगा जो रातों रात उन्हें स्लम एरिया छोड़ कर,
 दीन - हीन हालत मे जाना पड़ा.....??
दिल मे एक कसक सी रह गई और ये काश.... शब्द तो मुझे बहुत ही तकलीफ देने लगा...
रह रह कर मुझे रमन का मासूम चेहरा आँखों के आगे आने लगा...........
इस घटना की करीब 10 दिन हो गए होगे, लिखने तक
मैने नोटिस किया कि जब से रमन गया, सभी बच्चों का आना ही छूट गया मेरी शॉप पर ......
और ये अंतिम फोटो है मेरे पास दोनों भाई बहनो की, जो पोस्ट की है मैंने...इन बच्चों के लिए बहुत कुछ सोचा था हमने, पर समय को कुछ और ही मंजूर था
भगवान से ये ही दुआएँ मांगती हूं दिन रात की, वो जहां ही हो, परिवार सहित कुशल से हो...
उनके मासूम और मेरे प्रति विश्वास से भरी आंखे नहीं भूल पा रही हूं...... 

और आज भी शॉप पर बैठती हूं तो इंतजार रहता है कि काश सिर्फ एक बार मुझसे मिलने आ जाए रमन..अपने ठिठुरते हुए, रुके रुके कदमों से, मेरे चेहरे के भावों को पढ़ते हुए, कन्धे पर मैला सा झोला टांगे हुए.......


सरिता चंद
नोएडा

टिप्पणियाँ

  1. आपका बहुत बहुत शुक्रिया, मेरी कहानी को प्रकाशित करने के लिए 🙏🙏

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  2. Saritaji jindgi chalne ka naam h, eshwar ne une aur acche k liye yahn se bheja hoga, aapka saath etna hi tha, aap ne sada unnk bhalai k liye kaarye kiye.

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  3. सरिता जीवन मे ऐसे वाक्या होते है जो बाद मे सोचते और पछताते है काश ऐसा पहले कर लेते पर अपनी सोच अच्छी है ये मायने रखता है

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