सात शनिवार की नियमित परिक्रमा से होता है समस्याओ का निदान वनखंडी सरकार निखिल धाम गैपरा में।
आज की खबर
विश्व नाथ त्रिपाठी
यह कोई कहानी नहीं यथार्थ है।बता दूं कि मध्य प्रदेश के मुरैना जिले की जौरा तहसील में स्थित वनखंडी सरकार निखिल धाम गैपरा पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी पंचमानंद की तपस्थली व श्री हनुमान जी का एक सिद्ध स्थान है जहां हर शनिवार को दर्शनार्थियों की बहुत बड़ी भीड़ होती है।वास्तव में मान्यता है कि यहां विराजमान हनुमान जी की प्रतिमा की जो लगातार सात शनिवार आ कर परिक्रमा कर ले उसके सारे मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं ।यहां तक कि असाध्य रोगों से भी मुक्ति मिल जाती है ।
निर्जन स्थान में विद्यमान इस मूर्ति के सम्बंध में पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी पंचमानंद जी महाराज का कहना है कि यहां पर विराजमान हनुमान जी की यह मूर्ति सैकड़ों वर्ष पुरानी है जो कभी इस निर्जन स्थान पर मौजूद थी ।बताया जाता है कि पहले भी लोग यहां आकर परिक्रमा देकर अपना मनोरथ सिद्ध किया करते थे और आज भी भक्तों कीअटूट श्रद्धा फलीभूत हो रही है ।महाराज श्री का कहना है कि मैं यहां १९९५ ईं० में आया हूं तो एक नीम का पेड़ था वहीं हनुमान जी की यह छवि विराजमान थी शेष स्थान घोर जंगली झाड़ियों से घिरा था जो धीरे धीरे अब विशाल आश्रम का रूप ले चुका है । महाराज श्री के आने के बाद से स्थान का विकास होने लगा और आज शुद्ध पत्थर से मंदिरों का निर्माण लगभग पूर्णता की ओर है । हनुमान जी के साथ ही राम दरबार ,मां काली, स्फटिक शिवलिंग शिव परिवार के साथ ,मां लक्ष्मी, भुवनेश्वरी व देवी सरस्वती के साथ साथ स्फटिक व अष्टधातु का श्री यंत्र विराजमान हैं आम जनमानस के दर्शन व पूजन अर्चन के लिए खुला रहता है । यहां सावन के महीने में काफी भीड़ भाड़ दर्शनार्थियों और कांवड़ियों की रहा करती है।लोग अपनी मनोकामना की पूर्ति हेतु शंकर जी पर विभिन्न पदार्थों से वैदिक मंत्रों के साथ अभिषेक कराते हैं ।नव रात्रि में देवी अर्चन व पाठ का कार्यक्रम चलता है और कन्यापूजन अर्चन के बाद विशाल भंडारे के साथ विराम होता है ।गुप्त नव रात्रि में भी साधक गण यहां पर साधना करते हैं ।
यह सब कार्य महामंडलेश्वर स्वामी पंचमानंद जी की देख रेख में सम्पन्न होता है । हनुमान जी की तो इतनी कृपा है कि कोई भक्त आज तक निराश नहीं हुआ जिसने भी अर्ज लगाई लाभ अवश्य प्राप्त किया।
अगर हम यह कहें कि स्वामी जी की घोर तपस्या के कारण ही आज यह स्थान इतना जागृत हुआ तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। स्वामी जी एक श्रेष्ठ साधक हैं जो अपने शिष्यों के लिए ही नहीं बल्कि आम जनमानस के कल्याण के लिए बिना किसी भेदभाव के उपलब्ध रहा करते हैं । स्वामी जी अपने गुरू परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद के सानिध्य में गुढ़ सिद्धियां हासिल करते हुए हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त की और हनुमान जी के मंत्र से अभिमंत्रित जल ही रोगी के लिए अमृत बन समस्याओं का समाधान बन जाता है ।
यहां बैठे बैठे स्वामी जी ने अफ्रीका, आस्ट्रेलिया व लंदन तक के लोगों का कार्य सिद्ध किया, हनुमान जी की कृपा से असाध्य भी सांध्य हुए हैं।कितने ऐसे संतान हीनों को संतानें प्राप्त हुई जिनको चिकित्सकों ने कहा था कि संतान नहीं होगी।
कौन सो काज कठिन जग माहीं।
जो नहिं होई तात तुम पाहीं।।
यह चौपाई यहां अक्षरश: सिद्ध दिखाई देती है । हनुमान जी की कृपा भक्तों पर बरसती ही है ,बरसे भी क्यो न,स्वामी आज भी आठ दस घंटे साधना में लीन रहते हैं। शिष्यों के प्रति समर्पित भाव से कल्याण करने वाले हमेशा हनुमान जी की कृपा प्राप्त करते रहते हैं ।हम सब को भी ऐसे पावनधाम का दर्शन अपने आत्मीय जनों के साथ करना चाहिए।
पीठाधीश्वर स्वामी जी के जीवन के विषय में भी कुछ जान लेना आवश्यक प्रतीत होता है ।स्वामी जी बाल्यकाल से ही बड़े भक्त थे ।इनका जन्म एक संभ्रांत ब्रह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता जी का नाम हरि विलास तथा माता का नाम श्रीमती भगवती देवी था । माता पिता दोनों आध्यात्मिक थे , भगवान और संत पर अटूट श्रद्धा और विश्वास था। क्षेत्र के प्रतिष्ठित संत मंगलदास बाबा के आशीर्वाद से मां भगवती की कोख से बालक पंचमानंद का जन्म आज से ६७ वर्ष पूर्व मुरैना की धरती पर ही जौरा के पास गैपरा गांव में हुआ था । आध्यात्मिक चेतना के आरम्भिक लक्षण ही आगे चलकर इन्हें संन्यासी का मार्ग प्रशस्त किया। प्रारम्भिक शिक्षा के बाद ही गृहस्ती का भार ऊपर आ पड़ा लेकिन पूजा पाठ से मुंह नहीं मोड़ा ।काल की गति ने इन्हें स्वामी निखिलेश्वरानंद को गुरू के रूप में स्वीकार कराया और उन्हीं के सानिध्य में हनुमान जी को सिद्ध करने का उत्तम अवसर प्राप्त हुआ क्यों कि इनके गुरुदेव ने गुरू साधना करा कर गुरु शक्ति को पहले ही हृदयस्थ कर दिया था ।चौदह वर्षों तक अन्न और नमक का त्याग कर प्रयागराज से अपनी आध्यात्मिक यात्रा आरंभ कर आगे कदम बढ़ाते गये। अनेक तीर्थों का भ्रमण करते हुए बद्रीनाथ में साधना करते हुए सिद्धाश्रम के अधिकारी बन गये ।ऐसा बताया गया कि पूज्य गुरुदेव परमहंस के साथ कयी अलौकिक यात्राएं व छवियों के दर्शन किए हैं ।यही कारण है कि श्रद्धावान साधक व शिष्यों को आज भी सूक्षम रूप से मार्गदर्शन करते रहते हैं ।
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