प्रभु का नाम ही मानव का सबसे बड़ा धन है- कथा व्यास प्रदीप महाराज



आज की खबर 
विश्व नाथ त्रिपाठी 

 प्रताप गढ़ विपत्ति ही सबसे बड़ी संपत्ति है क्यों कि हमेशा प्रभु का ध्यान रहता है उक्त विचार आचार्य प्रदीप ने ग्राम सिया में राम भारत तिवारी के यहां चल रही भागवत कथा के विश्राम दिवस पर सुदामा चरित्र के वर्णन के प्रसंग में व्यक्त किया।
      आचार्य प्रवर ने कहा कि सुदामा जैसा मित्र और भक्त मिलना आसान नहीं है ।द्वापर में कृष्णावतार में श्री दामा का प्रसंग भागवत में आता है।यही श्रीदामा ही सुदामा के नाम से विख्यात हैं जिनका वर्णन विद्वान गण भागवत पुराण की कथा में वर्णन करते हैं ।सुदामा को गरीब मित्र के रूप में वर्णित किया गया है ।सुदामा के पास तो गोविंद नाम रूपी अगाध सम्पत्ति 
विद्यमान थी ।माया तो क्षणिक है जो क्षणभंगुर है लेकिन गोविंद नाम धन मरने के बाद भी साथ देता है ।पत्नी सुशीला के बार बार कहने पर सुदामा जी द्वारका अपने मित्र कन्हैया से मिलने गये ।प्रभु ने मित्र की दशा देख कर बहुत ही पछताए लेकिन सुदामा को विदाई में कुछ भी न मिलने के बाद भी कोई दुख नहीं हुआ।घर पहुंचने पर खुशी के स्थान पर कन्हैया से दूरी का मर्म मन में आया और संपत्ति त्याग कर वन में जाकर भजन का ही निर्णय लिया ।माया ममता की जड़ है ।ममता सांसारिकता का बंधन है इस लिए माया से दूर रह कर जनक की तरह भजन में लीन रहना चाहिए।
    आज हमें शिक्षा अपने धर्म ग्रंथों से लेने की आवश्यकता है।यदि हम आर्ष ग्रन्थों को पलटते रहेंगे तो निश्चित रूप से अपने कल्याण के साथ संपूर्ण मानव जाति का नहीं सृष्टि का भी संरक्षण कर सकोगे।

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